Vibhavana Alankar : विभावना अलंकार किसे कहते है, भेद और उदाहरण

विभावना अलंकार की परिभाषा – जब कारण के न होने पर भी कार्य का होना वर्णित होने पर विभावना अलंकार होता है।

विभवना अलंकार के उदाहरण –

1. ‘मुनि तापस जिन तें दुख लहहीं।
ते नरेस बिनु पावक दहहीं ॥’

जलना कार्य के लिए अग्नि-रूपी कारण होना चाहिए। यहाँ अग्नि-रूपी कारण के न होने पर भी जलना-रूपी कार्य हो गया है।

2. बिन घनस्याम धाम-धाम ब्रज-मंडल में,
ऊधो ! नित बसति बहार बरसा की है।

वर्षा कार्य के लिए बादल कारण विद्यमान होना चाहिए। यहाँ कहा गया है कि श्याम घन के न होने पर भी वर्षा की बहार रहती है।

घनश्याम = (1) पानी-भरा बादल; (2) कृष्ण। वर्षा = (1) जल-वर्षा, (2) अश्रु-वर्षा ।

3. केसव, वाकी दसा सुनि हौं अब आग बिना अँग-अंगनि डाढ़ी।

4. बिनु पद चलै सुनै बिनु काना।
कर बिनु कर्म करै विधि नाना ॥

अपूर्ण कारण से कार्य हो, रुकावट होने पर भी कार्य हो जाय, विपरीत कारण से कार्य हो और कार्य से कारण हो तब भी विभावना अलंकार होता है। जैसे-

1. जब अपूर्ण कारण से कार्य हो-

तो. सो को सिवाजी ! जेहि दो सौ आदमी सों जीत्यो
जंग सरदार सौ हजार असवार को ।

शिवाजी ने दो सौ सिपाहियों से लाख सिपाहियों के सरदार को जीत लिया। जीतना कार्य का कारण सेना है, पर दो सौ सिपाहियों की सेना लाख सेना को जीत सके, इसके लिए पर्याप्त नहीं होती, परन्तु फिर भी उसने जीत लिया। इस प्रकार अधूरे या अपर्याप्त कारण से कार्य हुआ।

2. जब कार्य की रुकावट उपस्थित होने पर भी कार्य हो जाय –

तेज¹ छत्रधारीन हू असहन ताप करन्त ।
ताप करना-कार्य । तेज-कारण ।

छत्ता होने से ताप करना कार्य नहीं हो सकता । छत्ता ताप-रूपी कार्य होने के मार्ग में रुकावट है, पर यहाँ छत्ता-रूपी रुकावट होने पर भी कार्य हो जाता है।

3. जब विपरीत कारण से कार्य हो-

कारे घन उमड़ि अँगारे बरसत हैं।

घन से अंगारे नहीं, पानी बरसता है, जो अंगारों का विरोधी है। पर यहाँ कहा गया है कि घन अंगारे बरसाते हैं।

4. जब कार्य से कारण उत्पन्न हो –

कर-कल्पद्रुम सों कस्यो जस-समुद्र उत्पन्न ।

हाथ दान देने में कल्पवृक्ष के समान हैं, उनसे यश का समुद्र उत्पन्न हुआ । समुद्र कल्पवृक्ष का कारण है, न कि कल्पवृक्ष समुद्र का। पर यहाँ कल्पवृक्ष को समुद्र का कारण कहा गया है।

विभावन अलंकार के अन्य उदाहरण –
  1. बिन पानी साबुन बिन निर्मल करै स्वभाव ।
  2. केसव, वाकी दसा सुनि हौ अब
    आग बिना अंग-अंगनि डाढी
  3. मूक होय वाचाल पंगु चढ़ै गिरिवर गहन ।
    जासु कृपा सु दयाल द्रबहु सकल कलिमलि दहन ।।
  4. राजभवन को छोड़ कृष्ण थे चले गये।
    तेज चमकता था उनका फिर भी भास्वर।।
  5. नाचि अचानक ही उठे, बिनु पावस वन मोर।
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