Veer Ras – Veer Ras ki Paribhasha | वीर रस – वीर रस की परिभाषा

वीर रस:- वीर रस का विषय उत्साह या जोश होता है। युद्ध करने के लिए अथवा नीति धर्म आदि की दुर्दशा को मिटाने जैसे कठिन कार्यों के लिए मन में उत्पन्न होने वाले उत्साह से वीर रस जागृत होता है। लड़ाई को देखकर, मारू बाजा एवं चरणों के वीर – गीत सुनकर, शत्रु को सामने पाकर, लड़ने का उत्साह होता है। इसी प्रकार कभी किसी दिन हीन शोकार्त्ता प्राणी को देखकर दया आ आती है और उसका कष्ट दूर करने का उत्साह होता है। कभी याचकों को देखकर दान देने का उत्साह होता है और कभी कष्ट सहकर और प्राण देकर भी धर्म पालन करने का उत्साह होता है। इस प्रकार के उत्साह अनेक प्रकार के होते है।

वीर रस के अवयव

स्थाई भाव –  उत्साह
संचारी भाव – आवेगशीलता, गर्व, उग्रता, शत्रु आक्रामकता, क्रोध, ईर्ष्या
आलम्बन – शत्रु और भिखारी
उद्दीपन – शत्रु की ललकार, शत्रु का अभिमान, वीर का दहाड़, पीड़ित का शोक, याचक का गुणगान
अनुभाव- भुजा, मुख खिलाना, आक्रमण करना, मरोड़, रोंगटे खड़े हो जाना

वीर रस के प्रकार | Veer Ras Ke Prakar

समर्थन भेद के आधार पर उत्साह चार प्रकार के होते हैं-
युद्धवीर – जब युद्ध का उत्साह हो
दयावीर – जब गरीबों पर दया करने का उत्साह हो
धर्मवीर – जब धर्म प्रचार या धार्मिक कार्य करने का उत्साह होता है
दानवीर – जब गरीबों को दान करने का उत्साह हो

वीर रस के उदाहरण | Veer Ras Ke Udaharan

“तनिक कर भाला यूं बोल उठा,
राणा!मुझको विश्राम न दे।
मुझको वैरी से हृदय-क्षोभ
तू तनिक मुझे आराम न दे॥

बुन्देलों हरबोलो के मुह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बात बातन बाद बाद होईगई, और बात मां बड़ी रार,
दुंहु दल मा हल्‍ला होगा दुन्हु खिंच लाई तलवार।
पैदल और घोड़े पर पैदल,
नॉक-नॉक-नॉक-नॉक कहेंगे, छप-छप तलवार कहा।

लागति लपटि कंठ बैरिन के नागिनी सी,
रुद्रहिं रिझावै दै दै मुंडन के माल कों।।

फहरी ध्वजा, फड़की भुजा, बलिदान की ज्वाला उठी।
निज जन्मभू के मान में, चढ़ मुण्ड की माला उठी।

धनुष उठाया ज्यों ही उसने,
और चढ़ाया उस पर बाण
धरा सिंधु नभ सहसा कांपे
विकल हुए जीवों के प्राण।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

साजि चतुरंग सन अंग उमंग धारी,
सरजा शिवाजी युद्ध जीत रहे हैं।।
भूषण भंत नाद बिहड़ नागरन के,
नदी नद मद गबरन की रालत॥

भामिनी देहूं सब लोक तज्यु हटा मोरे है मन भाई।
लोक चतुर्दश का सुख और धन बिना दुख के खर्च होता है।।
आइए हम उनके घर में बस जाएं और जुड़वा जोड़े की सेवा करें।
यदि आप रुचि नहीं रखते हैं तो आप हमेशा मुझमें रुचि रखते हैं।।

द्रौपदी बेफिक्र होकर फिरती है, परवाह नहीं करती,
धन, ऐश्वर्य और राजसत्ता की कोई इच्छा नहीं है।
सबसे पहले पांडवों और युधिष्ठिर का नाश होगा,
तभी बुझेगा धर्म का दीया।।

हाथ में झंडा लेकर बच्चों की महफ़िल सजती है,
झंडा कभी झुका नहीं पार्टी कभी रुकी नहीं
सामने पहाड़ हो, शेर की दहाड़ हो।
तुम निडर डरो मत तुम निडर खड़े रहो
वीर तुम बढ़ते जाओ, तुम धीर बढ़ते जाओ।

सच कह रहा हूँ मित्र, मुझे सुकुमार मत समझो,
यमराज से युद्ध में भी सदैव मेरी आज्ञा का पालन करना।
और क्या बात है, मुझे गर्व नहीं है,
वह मामा और अपने पिता से भी लड़ने से नहीं डरता।

लेकिन अब मेरी जमीन पर कोई अत्याचार नहीं होगा,
और किसी निर्बल पर अत्याचार न होगा।
अब हाटों में नहीं होगी गरीबी की नीलामी,
विनम्रता से कोई आंख बीमार नहीं होगी।।

दोस्तो हमने इस आर्टिकल में Veer Rasin Hindi के साथ – साथ Veer Ras kise kahate hain, Veer Ras ki Paribhasha, Veer Ras ke bhed के बारे में पढ़ा। हमे उम्मीद है आपको यह जानकारी पसंद आई होगी। आपको यहां Hindi Grammar के सभी टॉपिक उपलब्ध करवाए गए। जिनको पढ़कर आप हिंदी में अच्छी पकड़ बना सकते है।

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