भाषा – भाषा की परिभाषा, अर्थ, भेद, अंग एवं प्रकार

भाषा (Language)

भाषा के द्वारा हम अपने मन के भावों या विचारों को दूसरों के सामने बोलकर या लिखकर प्रकट करते हैं। एक मनुष्य का दूसरे से संपर्क का सबसे उत्तम साधन भाषा है। इशारों अथवा संकेतों को भाषा नहीं कहा जाता है, क्योंकि इनसे बात स्पष्ट नहीं हो पाती है।

जैसे एक बच्चा रोकर या हँसकर अपने मन की बात प्रकट करता है या एक गूंगा व्यक्ति संकेत देकर अपने मन की बात प्रकट करता है, परंतु उनकी बात पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाती। अत: मन के भावों की अभिव्यक्ति और जानकारी केवल भाषा के माध्यम से ही दी जा सकती है।

संसार में अनेक भाषाएँ प्रचलित हैं; जैसे–चीनी, अंग्रेजी, हिंदी, फ्रेंच, स्पेनी, रूसी, जर्मनी, जापानी, पुर्तगाली आदि। विश्व की भाषाओं में हिंदी का तीसरा स्थान है।

भाषा क्या होती हैं?

भाषा वह साधन है, जिसमें माध्यम से हम सोचते और अपने विचारों को व्यक्त करते है। मानव अपने भावों और विचारों की अभिव्यक्ति के लिए रूढ़ अर्थों में प्रयुक्त ध्वनि संकेतों की व्यवस्था ही भाषा है।” प्रत्येक देश की अपनी एक भाषा होती है, हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी है। संसार में अनेक भाषाएँ हैं। जैसे- हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, बँगला, गुजराती, पंजाबी, उर्दू, तेलुगु,

एक भाषा कईं लिपियों में लिखी जा सकती है और दो या अधिक भाषाओं की एक ही लिपि हो सकती है। भाषा संस्कृति का वाहन होने के साथ ही उसका अंग भी है। – रामविलास शर्मा

भाषा का अर्थ

‘भाषा’ शब्द संस्कृत की ‘भाष्’ धातु से बना है। ‘भाष्’ धातु का अर्थ है = (भाष् व्यक्तायां वाचि) ‘व्यक्त वाणी’। अर्थात् विचार व्यक्त करने, मनोभावों को कहने तथा मनोभावों को प्रकाशित करने के साधन को भाषा कहते हैं। इस प्रकार विस्तृत अर्थ में एक प्राणी अपने किसी उच्चारण अवयव द्वारा दूसरे प्राणी पर जो कुछ प्रकट करता है, वही भाषा है।

भाषा की परिभाषा

भाषा वह साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य अपने मन के भावों एवं विचारों का आदान – प्रदान करता है।
विश्व में अनेक भाषाएँ बोली जाती है जैसे – चीनी, अंग्रेजी, हिंदी, फ्रेंच, स्पेनी, रूसी, जर्मनी, जापानी, पुर्तगाली आदि। विश्व की भाषाओं में हिंदी का तीसरा स्थान है।

अनेक विद्वानों, भाषा वैज्ञानिकों एवं वैयाकरणों ने भाषा की परिभाषा दी है।
महाभाष्यकार पतंजलि ने कहा है – मनुष्यों की व्यक्त वर्णात्मक वाणी ही भाषा कहलाती है, इसी प्रकार हिन्दी के एक आचार्य ने कहा है-“ध्वन्यात्मक शब्दों के द्वारा विचारों का प्रकटीकरण ही भाषा है।” वस्तुतः भाषा यादृच्छिक ध्वनि संकेतों की वह पद्धति है, जिसके द्वारा समाज-विशेष के लोग परस्पर विचारों का आदान-प्रदान करते हैं।

भाषा में शैली

विकास की प्रक्रिया में भाषा का क्षेत्र भी बढ़ता जाता है। किसी समाज में एक जैसी भाषा बोलने वाले व्यक्तियों के बोलने का ढंग, उच्चारण-प्रक्रिया, शब्द-भंडार, वाक्य-विन्यास, आदि भिन्न-भिन्न हो जाने से उनकी भाषा में पर्याप्त अन्तर आ जाता है, इसी को भाषा की शैली कह सकते हैं।

भाषा की उत्पत्ति

भाषा की उत्पत्ति से आशय उस काल से है जब मानव ने बोलना आरम्भ किया और ‘भाषा’ सीखना आरम्भ किया। इस विषय में बहुत सी संकल्पनाएं हैं जो अधिकांशतः अनुमान पर आधारित हैं। मानव के इतिहास में यह काल इतना पहले आरम्भ हुआ कि इसके विकास से सम्बन्धित कोई भी संकेत मिलने असम्भव हैं।

भाषा की उत्पत्ति का सम्बंध इस बात से हैं कि मानव ने सर्वप्रथम किस काल में अपने मुख से निसृत होने वाली ध्वनियों को वस्तुओं-पदार्थों, भावों से जोड़ा। इतिहास के किस काल में मानव ने सामूहिक स्तर पर यह निश्चय किया कि किस शब्द का क्या अर्थ होगा।

‘भाषा की उत्पत्ति’ का प्रश्न भाषा-विज्ञान की विचार-सीमा में नहीं आता। विज्ञान जो पदार्थ का तात्त्विक विश्लेषण करके यह बता देगा कि यह भाषा किस वर्ग की भाषा है। उसके गुण-दोषों की चर्चा कर देगा पर उसके जन्म का प्रश्न की सीमा में जाता है। आजकल के भाषा वैज्ञानिक भाषा की उत्पत्ति के प्रश्न को भाषाविज्ञान की सीमा में नहीं मानते।

भाषा की उत्पत्ति के विषय में विद्वानों ने दो प्रकार के विचार-मार्ग अपनाए हैं जिन्हें प्रत्यक्ष मार्ग और परोक्ष मार्ग कहा जाता है-

(1) प्रत्यक्ष मार्ग : जिसमें भाषा की आदिम अवस्था से चल कर उसकी वर्तमान तक विकसित दशा का विचार किया जाता है।
(2) परोक्ष मार्ग भाषा की आज की विकसित दशा से पीछे की ओर चलते हुए उसकी आदिम अवस्था तक पहुंचने का प्रयास किया जाता है।

भाषा का प्रयोग (Uses of Language)

भाषा का प्रयोग हम बोलकर, लिखकर या पढ़कर करते हैं;

अध्यापिका ने बच्चों को बोलकर लिखवाया कि “हमारा भारत सोने की चिड़िया था।” बच्चों ने अध्यापिका के शब्दों को सुना और अपनी कॉपी पर लिखा।

यहाँ पर अध्यापिका ने बोला, बच्चों ने लिखा, उसके बाद अध्यापिका ने बच्चों की कॉपी से पढ़ा। भाषा द्वारा ही एक-दूसरे के विचारों को जाना जाता है।

भाषा के प्रकार (Kinds of Language)

भाषा के निम्नलिखित रूप होते हैं-
भाषा बोलने, लिखने एवं समझने के आधार पर तीन प्रकार की होती है।

( 1 ) मौखिक भाषा
( 2 ) लिखित भाषा
( 3 ) सांकेतिक भाषा

( 1 ) मौखिक भाषा (Oral Language)- हमारे द्वारा बोली जाने वाली भाषा ‘मौखिक भाषा’ कहलाती है;जैसे :-

प्रधानमंत्री जी ने भाषण दिया, उन्हें जो भी बातें लोगों को बतानी थीं वह सब बोलकर बता दीं। उदाहरण के लिए, राजेश और विशाल बातें कर रहे हैं, यह भी मौखिक भाषा का ही रूप है। मौखिक भाषा अस्थायी होती है।

अर्थात : – आमने-सामने बैठे व्यक्ति परस्पर बातचीत करते हैं अथवा कोई व्यक्ति भाषण आदि द्वारा अपने विचार प्रकट करता है तो उसे भाषा का मौखिक रूप कहते हैं

( 2 ) लिखित भाषा (Written Language)-जब हम अपन मन-जब हम अपने मन के भावों और विचारों को लिखकर प्रकट करते हैं। तब यह ‘लिखित भाषा’ कहलाती है; जैसे:-

अजय पुस्तक पढ़ रहा है। राधा कविता लिख रही है। लिखित भाषा स्थायी होती है।

अर्थात : – जब व्यक्ति किसी दूर बैठे व्यक्ति को पत्र द्वारा अथवा पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं में लेख द्वारा अपने विचार प्रकट करता है तब उसे भाषा का लिखित रूप कहते हैं।

( 3 ) सांकेतिक भाषा – संकेत भाषा या सांकेतिक भाषा एक ऐसी भाषा है, जिसे व्यक्ति विभिन्न प्रकार के दृश्य संकेतों (जैसे हस्तचालित संकेत, अंग-संकेत) के माध्यम से व्यक्त करता है।

सांकेतिक भाषा में बोलनें वाले व्यक्ति के विचारों को धाराप्रवाह रूप से व्यक्त करने के लिए, हाथ के आकार, विन्यास और संचालन, बांहों या शरीर तथा चेहरे के हाव-भावों का एक साथ उपयोग किया जाता है।

उदाहरण के लिए, एक छोटे बच्चे और उसकी माँ के बीच की भाषा सांकेतिक भाषा है। वह छोटा बच्चा अपनी समस्याओं और इच्छाओं को विभिन्न संकेतों के माध्यम से बताता है। जैसे कि अधिकतर बच्चों को जब भूख लगती है, तो वह रोने लगते हैं।

सांकेतिक भाषा का प्रयोग अधिकतर ऐसे व्यक्तियों के लिए होता है, जो शारीरिक रूप से दिव्यांग होते है, जैसे:- कान और मुँह से अपंग।

मानक भाषा

भाषा के स्थिर तथा सुनिश्चित रूप को मानक या परिनिष्ठित भाषा कहते हैं। मानक भाषा शिक्षित वर्ग की शिक्षा, पत्राचार एवं व्यवहार की भाषा होती है।

इस भाषा की व्याकरण तथा उच्चारण की प्रक्रिया लगभग निश्चित होती है। मानक भाषा को टकसाली भाषा भी कहते हैं। इसी भाषा में पाठ्य-पुस्तकों का प्रकाशन होता है। हिन्दी, अंग्रेजी, फ्रेंच, संस्कृत तथा ग्रीक मानक भाषाएँ है।

किसी भाषा के मानक रूप का अर्थ:- उस भाषा का वह रूप जो उच्चारण, रूप-रचना, वाक्य-रचना, शब्द और शब्द-रचना, अर्थ, मुहावरे, लोकोक्तियाँ, प्रयोग तथा लेखन आदि की दृष्टि से है। उस भाषा को सभी नहीं तो अधिकांश सुशिक्षित लोगों द्वारा शुद्ध माना जाता है।

एक मानक भाषा विभिन्न प्रकार की भाषा है जिसका उपयोग सरकारों द्वारा, मीडिया में, स्कूलों में और अंतर्राष्ट्रीय संचार के लिए किया जाता है। दुनिया में अंग्रेजी की विभिन्न मानक किस्में हैं, जैसे उत्तरी अमेरिकी अंग्रेजी, ऑस्ट्रेलियाई अंग्रेजी और भारतीय अंग्रेजी ।

हिंदी का मानक रूप

हिंदी के मुख्यत: दो रूप हैं— (1) क्षेत्रीय बाईस बोलियों का संकुल (2) मानक हिंदी ।

क्षेत्रीय बोलियों के संकुल के रूप में यह हिंदी क्षेत्र की समस्त बोलियों के समूह का प्रतिनिधित्व करती है, जिसकी चर्चा ऊपर की गई है। किंतु हिंदी का एक अर्थ उसके मानक रूप से भी है, यह हिंदी का केंद्रवर्ती रूप है। हिंदी की विभिन्न बोलियों के क्षेत्रीय रूप अपना अलग- अलग स्वरूप रखते हुए भी मानक भाषा के रूप में पर्यवसित भी होते हैं। हिंदी का यह मानक रूप जिसे खड़ीबोली भी कहा जाता है, वस्तुतः केवल कौरवी बोली (खड़ीबोली) जो मेरठ के आसपास बोली जाती है, से ही विकसित रूप नहीं है; जैसाकि बीम्, प्रियर्सन, सुनीतिकुमार चटर्जी तथा धीरेंद्र वर्मा ने माना है। इस संबंध में भोलानाथ तिवारी का मत सही प्रतीत होता है कि “हरियाणवी, ब्रज और दिल्ली की खड़ीबोली- इन तीनों की विशेषताओं का मिश्रित रूप, जो दिल्ली में राजभाषा फ़ारसी की कोमल छाया में विकसित हुआ, आज की मानक खड़ीबोली है, जिसकी तीन शैलियाँ (हिंदुस्तानी, उर्दू, हिंदी) हैं।”

भाषा के अंग

भाषा के भेद-भाषा के प्रमुख भेद या रूप आठ हैं-
(1) मूल भाषा
(2) व्यक्ति बोली या व्यक्ति भाषा
(3) उपबोली या स्थानीय बोली
(4) बोली और भाषा
(5) आदर्श भाषा या परिनिष्ठित भाषा
(6) राष्ट्रभाषा
(7) विशिष्ट भाषा
(8) कृत्रिम भाषा

भाषा की इकाइयाँ -भाषा की निम्नलिखित पाँच इकाइयाँ हैं –

1. ध्वनि -हमारे मुख से निकलने वाली प्रत्येक पूर्ण व स्वतन्त्र आवाज ध्वनि कहलाती है ।

2. वर्ण – मुख से उच्चरित स्वर-व्यंजन ध्वनियाँ जब लिखित रूप में प्रयुक्त होती हैं, उसे वर्ण कहते हैं

3. शब्द – वर्णों के सार्थक समूह को शब्द कहते हैं

4. पद – वाक्य में प्रयुक्त विभक्ति-युक्त शब्द को पद कहते हैं ।

5. वाक्य – सार्थक शब्द- समूह को अन्वितार्थबोधक एवं पूर्ण विचाराभिव्यक्ति होने पर वाक्य कहते हैं। हिन्दी की बोलियाँ-हिन्दी केवल खड़ी बोली का ही विकसित रूप नहीं है बल्कि जिसमें अन्य बोलियाँ भी समाहित हैं जिनमें खड़ी बोली भी शामिल हैये अग्र प्रकार हैं-

भारतीय भाषाएँ (Indian Languages)

भारतीय संविधान के अनच्छेद 21 के अनसार भारत की राष्टीय भाषा हिंदी है। इस भाषा का 14 4 राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्वीकार किया गया है।

संसार में अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं. जैसे – फ्रेंच, जर्मन, तमिल, उर्दू, अरबी, फारसी, हिंदी, अंग्रेजी, चीनी, हिब्रू आदि। अनेक भाषाए बोली जाती हैं। इन भाषाओं में से 23 भाषाओं को संविधान से मान्यता प्राप्त है। ये भाषाएँ निम्नलिखित हैं-

हिंदी, सस्कृत, उदू, पजाबी, मराठी, उड़िया, गुजराती, कन्नड़, बंगला, तमिल, तेलुगु, मलयालम, मणिपूरी, कोकणी सिंधी, नेपाली, असमिया, कश्मीरी, बोदो, अंग्रेजी, संथली, डोगरी, मैथिली।

बोली (Dialect)

भाषा एक विस्तृत क्षेत्र में बोली जाती है। बोली का एक अपना सीमित क्षेत्र होता है। बोली का अपना कोई लिखित रूप नहीं होता। इसका कोई भी लिखित साहित्य नहीं होता। भारतवर्ष में लगभग 1,652 भाषाएँ बोली जाती हैं।

जिस क्षेत्र का आदमी जहाँ रहता है, उस क्षेत्र की अपनी एक बोली होती है। वहाँ रहने वाला व्यक्ति, अपनी बात दूसरे व्यक्ति को उसी बोली में बोलकर कहता है तथा उसी में सुनता हैजैसे-शेखावाटी (झुन्झुनू, चुरू व सीकर) के निवासी ‘शेखावाटी’ बोली में कहतेहैं एवं सुनते हैं। इसी प्रकार कोटा और बूँदी क्षेत्र के निवासी ‘हाड़ौती’ में, अलवर

क्षेत्र के निवासी ‘मेवातीमें, जयपुर क्षेत्र के निवासी ‘ढूंढाड़ी’ में मेवाड़ के निवासी ‘मेवाड़ी’ में तथा जोधपुर, बीकानेर और नागौर क्षेत्रों के निवासी ‘मारवाड़ी’ में अपनी बात दूसरे व्यक्ति को बोलकर कहते हैं तथा दूसरे व्यक्ति की बात सुनकर समझते हैं।

अतः भाषा का वह रूप जो एक सीमित क्षेत्र में बोला जाये, उसे बोली कहते हैं। कई बोलियों तथा उनकी समान बातों से मिलकर भाषा बनती है। बोली व भाषा का बहुत गहरा सम्बन्ध है।

भाषा का क्षेत्रीय रूप बोली कहलाता है। अर्थात् देश के विभिन्न भागों में बोली जाने वाली भाषा बोली कहलाती है और किसी भी क्षेत्रीय बोली का लिखित रूप में स्थिर साहित्य वहाँ की भाषा कहलाता है।

भाषा तथा बोली में अंतर

भाषा और बोली में अंतर होता है। निम्नलिखित तथ्यों के द्वारा हम यह अंतर जान सकते हैं

बोलीभाषा
बोली का क्षेत्र कुछ जिलों अथवा गाँवों तक सीमित होता है।भाषा का क्षेत्र व्यापक होता है।
बोली किसी क्षेत्र विशेष में बोली जाती है, इसलिए यह विकसित नहीं होती है।भाषा बोली का पूर्ण विकसित रूप होता है।
बोली में साहित्य-लेखन क्षेत्रीय होता है।भाषा में साहित्य की प्रचुरता होती है।
बोली का प्रयोग राजकार्यों में नहीं होता है।भाषा का प्रयोग राजकार्यों में भी होता है।
बोली की व्याकरण सीमित या नहीं होती है।भाषा की व्याकरण सुव्यवस्थित एवं पूर्ण होती है।
कन्नौजी, कुमाउनी, मेवाती, आदि बोली के रूप है।हिन्दी, अंग्रेजी, आदि भाषा के रूप है।
भारत के राज्यों में बोली जाने वाली भाषाएँ

कौन-सी भाषा किस प्रांत या राज्य में बोली जाती है, इसका ज्ञान होना बहुत जरूरी है। आइए, भारत के विभिन्न प्रांतों और राज्यों में बोली जाने वाली भाषाओं के बारे में जानें-

भाषा मूलतः ध्वनि – संकेतों की एक व्यवस्था है, यह मानव मुख से निकली अभिव्यक्ति है, यह विचारों के आदान-प्रदान का एक सामाजिक साधन है और इसके शब्दों के अर्थ प्रायः रूढ़ होते हैंभाषा अभिव्यक्ति का एक ऐसा समर्थ साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचारों को दूसरों पर प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार जाना सकता है। अतः हम कह सकते हैं कि “भावों और विचारों की अभिव्यक्ति के लिए रूढ़ अर्थों में प्रयुक्त ध्वनि संकेतों की व्यवस्था ही भाषा है।” प्रत्येक देश की अपनी एक भाषा होती हैहमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी है। संसार में अनेक भाषाएँ हैं। जैसे- हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, बँगला, गुजराती, पंजाबी, उर्दू, तेलुगु,

मलयालम, कन्नड़, फ्रेंच, चीनी, जर्मन इत्यादि ।

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